Arawalli Trekker

इस ब्लॉग़ में अरावली पर्वत श्रंखला में स्थित Historical Fort,Historical Temple,Prehistorical Place,Natural Place,Historical Dam,Wildlife sanctuary,Ancient Bodhist Place के बारे में जानकारी दी गयी है

शनिवार, अप्रैल 17, 2021

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान

मध्यप्रदेश के मालवा कि पश्चिमी सीमाओं तथा अरावली की पहाड़ियों पर स्थित गांधी सागर वन्य अभयारण्य क्षेत्र को चंबल नदी मध्य प्रदेश के मंदसौर तथा नीमच जिलों की सीमा में विभाजित करती है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 


अरावली की लाखो वर्ष अति प्राचीन इन पहाड़ियों में स्थित इस अभयारण्य ने कई बेशकीमती वनस्पतियों, विलुप्त प्राय जीवों,कई ऐतिहासिक इमारतों कई प्राकृतिक स्थलों,कई पाषाण कालीन मानव सभ्यताओं के साक्ष्यों को अपने आंचल में संजोया हुआ है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान


यह अभयारण्य प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए महत्वपूर्ण स्थान है! पर्यटक इस अभयारण्य मैं आकर कुछ समय तक शांति तथा आनंद की प्राप्ति कर सकते हैं! अभयारण्य में प्रवेश निशुल्क है तथा आप स्वयं के वाहन से जा सकते हैं! आइए जानते हैं गांधीसागर वन्य जीव अभ्यारण के बारे में!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 

Table of contents


गांधी सागर वन्यजिव अभयारण्य का इतिहास !

गांधी सागर अभयारण्य लगभग 370 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है ! भानपुरा नीमच मार्ग इसे दो भागों में विभाजित करता है! यह अभयारण्य राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है! 1974 में इस अभयारण्य को अधिसूचित किया गया तथा 1983 में भारत सरकार ने इसमे और क्षेत्र सम्मिलित कर वर्तमान स्वरूप दिया!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 


अभयारण्य की मुख्य वनस्पतियां!

गांधी सागर अभ्यारण पूरे वर्ष भर खुला रहता है! विभिन्न प्रकार की अरावली पहाड़ियों के साथ जंगल सूखा मिश्रित तथा पर्णपाती है ! गांधी सागर जल मग्न क्षेत्र के आसपास घास का मैदान है !

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 


अभयारण्य क्षेत्र में पाए जाने वाले प्रमुख वृक्षों की प्रजातियों में धावड़ा, बबूल - जिसका गोंद बहुत लाभदायक माना जाता है!  और खाने के काम में आता है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 


खेरा - जिसका कत्था बनता है जो पान तथा मसाले में काम में आता है! 

तेंदू - इसके पान बीड़ी  बनाने के काम में आते हैं  तथा तेंदू का फल चीकू के समान मीठा होता है!

करौंदा- एक छोटा सा काला फल होता है जो खाने बहुत ही मीठा और स्वास्थ्यवर्धक होता है! कच्चे करौंदे की सब्जी बनाकर खाई जाती है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान 


खांखरा, पलाश - के पत्तों की आदिवासियों द्वारा पत्तल बनाई जाती है! तथा सुर्ख लाल फूलों का  रंग बनाया जाता है! इसके अलावा भी कई प्रकार के वृक्षों को यहां देखा जा सकता है!

अभयारण्य के प्रमुख वन्य जीव !

गांधी सागर अभयारण्य में रहने वाले मुख्य जीव हिरण तथा नीलगाय हैं, जिनमें सबसे आसानी से देखे जाने वाले चिंकारा या भारतीय गजेल और नीलगाय है जो यहां झुंडो में विचरण करते हुए दिखाई दे जाते हैं!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में विचरण करती नीलगाय 

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में घूमता हिरनों का झुण्ड 


इसके अलावा सांभर, भारतीय तेंदुए, लंगूर, मोर, जंगली कुत्ते,ऊदबिलाव लकड़बग्गे, कालाभालू, सियार, लोमड़ी तथा जंगली सूअर है ! गांधी सागर अभ्यारण में प्रमुख रूप से गिद्धों की कई प्रजातियां पाई जाती है !

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य का प्रमुख वन्यजीव तेंदुआ 


इसके अलावा आपको गांधी सागर झील में बोटिंग के दौरान कई प्रवासी तथा अप्रवासी पक्षियों, मगरमच्छ, कई प्रजातियों की मछलियां जैसे सील आदि को देखने का अवसर प्राप्त होता है!

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गांधीसागर झील में बोटिंग का आनंद 

अभयारण्य के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल !

गांधी सागर अभयारण्य में  कई ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक महत्व के स्थान आपको देखने को मिलेंगे! जिनमें चौरासीगढ़ का किला हमें मध्ययुगीन काल का अहसास कराता है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित चौरासीगढ़ किले के नाम से मशहुर सूर्यास्त देखने की जगह 


वही हिंगलाजगढ़ का किला हमें 12 वीं सदी के परमार काल के स्वर्णिम इतिहास से रूबरू करवाता है !

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित हिंगलाज गढ़ का किला 


तथा गांधी सागर अभयारण्य के निकट स्थित गांधी सागर बांध हमारी आजादी के बाद की गई विकास यात्रा को दर्शाता है!

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गांधीसागर बांध का दृश्य 


सर्किट हाउस व भारतमाता का नजारा तो देखते ही बनता है!

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गांधीसागर बांध के भारत माता गार्डन में स्थित भारतमाता की विशालकाय प्रतिमा 


आयुर्वेद के जनक धनवंतरी का स्थान तथा नागों के राजा तक्षक की शरणस्थली ताकेश्वरधाम हमें महाभारत काल में ले जाता है,

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ताखेश्वरजी का कुंड 


वहीँ चतुर्भुज नाथ मंदिर मैं स्थापित दिव्य और मनमोहक भगवान विष्णु की प्रतिमा हमें 12 वीं सदी की ओर ले जाती है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित चतुर्भुजनाथ मंदिर में चतुर्भुज नाथ की प्रतिमा 


तथा चतुर्भुज नाले में स्थित पाषाण कालीन शैलचित्र दुनिया की सबसे प्राचीन व सबसे लंबी शैलचित्र श्रंखला हमें 35 हजार साल से भी अधिक पुरानी उन्नत मानव सभ्यता के जीवन की झलक दिखलाती है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित चतुर्भुज नाला के शैलचित्र 


इस के अलावा भी  इस अभयारण्य में हर कदम पर प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थान देखने को मिलेंगे,जैसे चिब्बड़ नाला,कथिरिया का झरना,रामकुंड का झरना, छोटा, बड़ा महादेव का झरना, दर की चट्टान जो विश्व की सबसे प्राचीनतम रॉक कला के अतीत को प्रकट करती है!

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित कथीरिया का झरना 

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित रामकुंड का झरना 

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बड़ा महादेव झरना 

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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित बिजोलिया का झरना 

इसके आलावा भी यहां गांधी सागर अभ्यारण में अनगिनत प्राकृतिक स्थान तथा कई ऐतिहासिक मंदिर कई प्रागैतिहासिक जगह मौजूद है जिनके बारे में एक पोस्ट में बता पाना संभव नहीं है!

गांधीसागर अभयारण्य की आगामी परियाजना !

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य मैं विलुप्त हो चुके चीतों को फिर से बसाये जाने की योजना का क्रियान्वयन चल रहा है इसके लिए अफ्रीकन चीतों को यहां बसाने की योजना है!

गांधी सागर अभ्यारण में स्थित अरावली की पहाड़ियों मैं घास के मैदान, पहाड़ियों में स्थित गुफाएं, पानी की प्रचुरता चीतों को बसाने के लिए उपयुक्त मानी जाती है! इस कार्य के लिए पर्यटन विकास निगम ने ₹15 करोड़ का कार्य निर्धारित किया है!

पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए पर्यटकों के घूमने, फिरने के लिए दो सफारी ओपन जिप्सी जिसमें बैठकर पर्यटक वन्य प्राणियों से रूबरू हो सकें तथा ठहरने के लिए रात में कैंपिंग की व्यवस्था शामिल है !

वन्य प्राणियों के पीने के पानी की व्यवस्था के लिए अभयारण्य में मौजूद लगभग डेढ़ सौ तालाबों का गहरीकरण,सौंदर्यीकरण तथा नए तालाबों का निर्माण शामिल है! अभयारण्य में मौजूद शाकाहारी वन्य प्राणियों जैसे हिरण, चीतल, नीलगाय, खरगोश आदि के लिए चरागाह को विकसित करना जिससे गर्मियों के समय इन वन्यजीवों को पर्याप्त भोजन मिल सके तथा पर्यटक इन वन्य प्राणियों को एक ही स्थान पर देख सके!

अभ्यारण में मांसाहारी वन्यजीवों के भोजन के लिए लिए 500 चीतल राजगढ़ जिले से लाकर यहां छोड़े जा रहे हैं वर्तमान समय में अभ्यारण के अंदर 2 वर्ष पूर्व गणना के अनुसार लगभग 50 तेंदुए, लकड़बग्घे, तथा अन्य मांसाहारी प्राणियों के साथ 225 प्रजातियों के पक्षी मौजूद है! उम्मीद है आने वाले कुछ समय में आपको यहां चीतों को देखने का अवसर मिलेगा!

यात्रा के दौरान सावधानियाँ !

  • अकेले न जाएं किसी जानकार को साथ लेकर जाए !
  • उचित मात्रा में पानी साथ रखें व खाने पिने का प्रबन्ध रखें !
  • यदि आप रक्त चाप रोगी हैं तो जाने से बचे या अपने साथ उचित दवाई गोलियों का प्रबंध रखें !
  • ये क्षेत्र अभयारण्य का हिस्सा है तथा यहां कई जंगली  जानवर तेंदुआ,भालू, लकड़बग्गा आदि का निवास है !अतःहमेशा सावधान रहे !

कब जाएं !

वैसे तो इस स्थान पर किसी भी मौसम में जा सकते हैं परन्तु वर्षा ऋतू में रास्ते में कीचड़ हो सकता है !गर्मी के मौसम मे वातावरण शुष्क होने से तेज गर्मी होती है !अक्टूबर माह से मार्च माह तक मौसम ठंडा होने से जाना सबसे अनुकूल होता है !

कैसे जाए !

भानपुरा मालवा मध्य प्रदेश मंदसौर जिले का हिस्सा है जो  राजस्थान झालावाड़ जिले से सटा हुआ है! नजदीकी रेलवे स्टेशन भवानी मंडी जो कि 25 किलोमीटर पड़ता है और रामगंज मंडी जो कि 40 किलोमीटर पड़ता है! यहां से बस मार्ग द्वारा भानपुरा आसानी से पहुंचा जा सकता है!और भानपुरा से व्यक्तिगत वाहन बाइक या कार द्वारा अभयारण्य तक पंहुचा जा सकता हैं !

कहां रुकें !

गांधी सागर अभयारण्य में आवास के लिए सर्किट हाउस तथा जल संसाधन विभाग का गेस्ट हाउस है!कोशिश करने पर व्यवस्था हो जाती है ! इस के अलावा अगर आपका बजट ठीक है तो हिंगलाज रिसोर्ट में रुकना एक अच्छा विकल्प हो सकता है! अग्रिम बुकिंग करना ठीक रहेगा !

इस लेख के माध्यम से मैंने अरावली पहाड़ में स्थित मालवा के  गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य के बारे में विस्तृत जानकारी दी है ! गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूं! उम्मीद करता हूं कि आपको यह लेख पसंद आये !

आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं !

पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

गुरुवार, अप्रैल 15, 2021

दूधाखेड़ी माताजी का मंदिर भानपुरा मध्यप्रदेश

मध्य प्रदेश मालवा के मंदसौर जिले के भानपुरा तहसील से 12 किलोमीटर दूर भानपुरा गरोठ मार्ग पर जगत जननी केसरबाई महारानी दूधाखेड़ी माताजी का करीब 700 साल पुराना आस्था और विश्वास का सबसे बड़ा मंदिर है ! इस चमत्कारी मंदिर में दुधाखेड़ी माताजी अपने पंच रूप में विराजमान है,जहां हजारों की संख्या में खास तौर से लकवा ग्रस्त व अन्य शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त मरीज कुछ ही दिनों में स्वस्थ होकर माता के गुणगान करते हुए जाते हैं!

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दुधाखेड़ी माताजी का मंदिर भानपुरा मध्यप्रदेश 

गांधी सागर बांध-भानपुरा (M. P. ) के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


हमेशा की तरह नवरात्रा में मुझे दूधाखेड़ी माताजी के दरबार में जाने का मौका मिला दूधाखेड़ी माताजी का मंदिर मेरे गांव से करीब 10 किलोमीटर पड़ता है! मैं अपने घर से सुबह 9:00 बजे अपने एक साथी के साथ बाइक लेकर निकल पड़ा !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर 


हर साल नवरात्रि के समय दूधाखेड़ी रास्ते में दो-तीन जगह श्रद्धालुओं द्वारा  निशुल्क भंडारे की व्यवस्था रहती थी,लेकिन इस साल कोरोना महामारी की वजह से यह व्यवस्था देखने को नहीं मिली ! 

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दूधाखेड़ी माताजी के अस्थायी आवास के बाहर का दृश्य 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन हिंगलाज गढ़ तथा गढ़ में स्थित हिंगलाज माता के मंदिर के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें !


कई लोग हमें मार्ग में दूधाखेड़ी माताजी के मंदिर तक की पैदल यात्रा करते हुए मिले! इस साल भी कोरोनावायरस की महामारी की वजह से प्रशासन ने हर साल नवरात्रा में लगने वाले मेले के आयोजन को स्थगित कर दिया है, तथा बिना मास्क लगाए तथा उचित दूरी के मंदिर में प्रवेश निषेध है! हमने इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए मंदिर में दर्शन किए ! आगे आइए जानते हैं, दूधाखेड़ी मंदिर के बारे में!

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दूधाखेड़ी माताजी का अस्थायी आवास स्थल 

Table of contents



दूधाखेड़ी माता जी का इतिहास!

रावत मीणा भाट की पोथी के अनुसार माता के परम भक्त मोडी गांव निवासी दूधाजी रावत को माता ने स्वप्न में आकर कहा था की आने वाले समय में परिवर्तन के कारण मैं अपना स्थान परिवर्तन करना चाहती हूं! प्राचीन समय में जहां आज माता का मंदिर है वहां घना जंगल हुआ करता था !और यहां एक व्यक्ति पेड़ काट रहा था उसी समय माता अपने देवी रूप में आई और कहा कि हरे पेड़ों को काटना लाखों लोगों को मारने के समान महापाप है! व्यक्ति ने पेड़ काटना बंद कर दिया और लौटने लगा !उस व्यक्ति को पश्चिमी क्षेत्र से वृद्धा आती हुई दिखाई दी और वहां वन से दूध की धारा बहने लगी! दूध की धारा देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से लोगों का जमावड़ा होने लगा! दूधा जी रावत ने इस स्थान पर आकर देखा तथा यहां माता की मूर्ति व मंदिर की स्थापना की! जिस जगह दूध की धारा बह रही थी आज वहां मां की प्रतिमा स्थापित है और कुंड बना हुआ है! तथा इस लोक देवी को दुधाखेड़ी माताजी के नाम से प्रसिद्धि मिली! दूधा जी रावत ने आजन्म देवी की पूजा अर्चना की,बाद में गोसाईयों को यहां की पूजा का भार सौंपा! गुसाइयों से तेलिया खेड़ी में बसने वाले नाथों ने पूजा भार ले लिया! वर्तमान में तेलिया खेड़ी गांव का नाम दूधाखेड़ी गांव हो गया !

मंदिर में जल रही है एक दिव्य ज्योति!

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दूधाखेड़ी माताजी मंदिर में जलती दिव्य ज्योति 

चिब्बड़ नाला-भानपुरा (M.P.)गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन चिब्बड़ माता के मंदिर तथा पाषाण कालीन शैलचित्र के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


श्रद्धालुओं के लिए आशीर्वाद स्वरुप दूधाखेड़ी माताजी की प्रतिमा के सम्मुख प्राचीन काल से एक दिव्य ज्योति प्रज्वलित है! सुबह व शाम के समय मां की विशेष आरती व श्रंगार होता है, उस समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं!

प्राचीन राजा महाराजाओं ने करवाया था निर्माण कार्य यहाँ !

इंदौर की महारानी अहिल्याबाई अपने विश्वासपात्र एवं वीर  अंगरक्षिका जो सोंधिया राजपूत समाज से थी उनके साथ यहां दर्शन के लिए आई थी! तथा यहां एक धर्मशाला का निर्माण कराया था! महारानी अहिल्याबाई ने मूर्ति के यहां 4 खंबे लगाकर छाया भी करवाई थी!

इसके बाद यशवंत राव होलकर, शिवाजी राव होलकरतुकोजीराव होलकर,झालावाड़ दरबार जालिम सिंह तथा ग्वालियर नरेश सिंधिया ने भी यहां धर्मशाला निर्माण करवाया! सीतामऊ के राजा ने अपने राज्य में मंदिर के पुजारियों को खेती हेतू जमीन जागीर में दी थी!

कई राजा महाराजाओं की आराध्य देवी रही है दूधाखेड़ी माता!

लोक मान्यता के अनुसार पौराणिक नरेश मोरध्वज तथा कोटा के झाला जालिम सिंह की आराध्य देवी रही हैI

आधुनिक भारत के नेपोलियन कहे जाने वाले मराठा शाशक महाराजा यशवंतराव होलकर जब भी युद्ध में जाते थे तब माता के यहां आकर दर्शन करते थे! कहते हैं माता के यहां रखी उनकी तलवार अपने आप उठकर हाथ में आ जाती थी !उसी तलवार को लेकर वै युद्ध में प्रस्थान करते थे और अपने पास की तलवार माता जी के यहां रख देते थे! यशवंत राव होल्कर ऐसे सेनानायक थे जिन्होंने पराजय का स्वाद कभी नहीं चखा था!

आज भी यशवंतराव होल्कर की तलवार माताजी के मंदिर में दिवार पर टंगी हुई यहां देखी जा सकती है !

दोनों नवरात्रा में लगता है भव्य मेला !

प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रा और बड़े नवरात्रा में  यहां एक भव्य मेले का आयोजन होता है! मालवा, मेवाड़, हाडोती अंचल के दूरदराज गांवों से हजारों लोग पदयात्रा करते हुए दर्शन के लिए आते हैं! कई धार्मिक व्यक्ति मार्ग में भंडारे का आयोजन करते हैं!

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दूधाखेड़ी माताजी की पंचरुपिय दिव्य प्रतिमा 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित प्राचिन एवं ऐतिहासिक चतुर्भूज नाथ मंदिर तथा चतुर्भूज नाला में स्थित विश्व की सबसे लंबी पाषाणकालीन शेलचित्र श्रंखला के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें !


नवरात्रा के समय माता के नौ रूप देखने को मिलता है! रोज नए रूप में माता अपने भक्तों को दर्शन देती है !मान्यता है कि माता की मूर्ति इतनी चमत्कारी है कि कोई भी भक्त माता की मूर्ति से आंख नहीं मिला पाता है! यहां आकर भक्तों को शारीरिक विकलांगता तथा मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है!

पहले बलि प्रथा का था रिवाज यहाँ !

पहले मंदिर में बलि प्रथा का रिवाज था! लेकिन करीब 40 साल पूर्व बलि प्रथा के दौरान आकाश से बिजली गिरी थी! और बलि के मवेशी बच गए !इस चमत्कार के बाद यहां बलि प्रथा खत्म कर दी गई इसके बाद यहां बलि के नाम पर जिंदा जानवर मुर्गा, बकरा आदि छोड़े जाने लगे !जानवरों की तादाद बढ़ने पर यहां मुर्गा, बकरा चिन्ह अंकित चांदी के सिक्के मन्नत पूरी होने के बाद चढ़ाए जाने लगे हैं!

वर्तमान समय में चल रहा है मंदिर का भव्य नव निर्माण !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन नागों के राजा तक्षक तथा आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि जी के निवास स्थान प्राचिन तक्षकेश्वर मंदिर तथा पवित्र झरने के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें 


वर्तमान में  34 करोड़ 18 लाख रुपए की लागत से दुधाखेड़ी माताजी के भव्य मंदिर के नव निर्माण का कार्य  चल रहा है! माउंट आबू से लाल पत्थरों को तराश कर लाया जा रहा है!

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर 


लेकिन बहुत ही निराशा वाली बात है की मंदिर के नवनिर्माण का कार्य बहुत ही धीमी गति से चल रहा है और कार्य चलते हुवे लगभग पांच वर्ष हो चुके है !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर 

दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत मालाओं में से एक अरावली पर्वत के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें!


न जाने कब मंदिर के निर्माण का कार्य पूरा होगा लेकिन उम्मीद है की कभी न कभी तो मंदिर के निर्माण का कार्य पूरा होगा !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर


खैर वर्तमान में काफी लम्बे समय से दुधाखेड़ी माताजी की प्रतिमा एक टिनशेड तिरपाल के निचे विराजीत है और आगे भी माताजी को कितने लम्बे समय और तिरपाल में रहना पड़ सकता है इस बात की कोई गारंटी नहीं है !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर

मंदिर परिसर में एक करोड़ 41 लाख रुपए की लागत से एक फिजियोथैरेपी सेंटर बनाया जाना प्रस्तावित है !

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर


मंदिर परिसर में आंतरिक कार्यों और हाई मास्क लगाने के लिए 15 लाख रुपए तथा पेयजल की बड़ी टंकी के निर्माण के लिए 2 लाख 70 हजार रुपए दिया जाना प्रस्तावित है! उम्मीद है जल्द ही भक्तों को माता के भव्य मंदिर के दर्शन करने का सौभाग्य मिलेगा!

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दूधाखेड़ी माताजी का भव्य नवनिर्माणाधीन मंदिर


कैसे जाएं  !

दूधाखेड़ी माताजी का मंदिर मध्य प्रदेश मालवा मंदसौर जिले के भानपुरा तहसील का हिस्सा है! नजदीकी रेलवे स्टेशन दिल्ली मुंबई रेल मार्ग पर स्थित भवानीमंडी जो कि 10 किलोमीटर है ! यहां से बस मार्ग अथवा निजी वाहन द्वारा दूधाखेड़ी मंदिर आसानी से पहुंचा जा सकता है!

इस लेख के माध्यम से मैंने भानपुरा के ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल दूधाखेड़ी मंदिर के बारे में विस्तृत जानकारी दी है !उम्मीद करता हूं कि आपको यह लेख पसंद आये !

आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं !

पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !

 


बुधवार, अप्रैल 07, 2021

अरावली पर्वत का विस्तार व जानकारी

अरावली पर्वत भारत ही नहीं दुनिया के सबसे प्राचीनतम पर्वतो में से एक है ! जो कि लगभग 60 करोड़ वर्षों से भी अधिक पुराना है !अरावली पर्वत की उम्र की तुलना अगर हिमालय पर्वत से की जाए तो हिमालय पर्वत एक 10 साल का बच्चा है जबकि अरावली पर्वत 90 साल का दादा है!

the gret aravali mountain range
अरावली पर्वतमाला  

गांधी सागर बांध-भानपुरा (M. P. ) के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


अरावली पर्वत गुजरात से अपनी यात्रा शुरू करते हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा  से होकर लगभग 700 किलोमीटर की यात्रा करते हुए दिल्ली में जाकर समतल होता है!

अरावली पर्वत की औसत ऊंचाई लगभग 400 से 600 मीटर है तथा कहीं-कहीं 1000 मीटर से भी अधिक है! और चौड़ाई 10 किलोमीटर से लेकर 100 किलोमीटर तक है!

अरावली पर्वत  कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण का साक्षी भी रहा है, जिसमें मुख्य दिल्ली का राष्ट्रपति भवन,जामा मस्जिद जो रायसिना की पहाड़ी (जो अरावली पर्वत की श्रंखला का ही हिस्सा है ) पर बना हुआ है!


Table of contents


क्यों कहा जाता है अरावली ?

अरावली शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है अरा +वली अरा का मतलब होता है रेखा तथा वली का मतलब है पर्वत !कुछ लोगो का मानना है की अरावली शब्द आडावली से लिया गया है आड़ा मतलब यात्रा करते समय रास्ते में आड़े आने वाला पर्वत और यही कारण है की राजस्थान में इस पर्वत को आड़ा डूंगर के नाम से जाना जाता है !

the gret aravali mountain range
अरावली पर्वतमाला  


एक और मान्यता है की अरावली पर्वत का शिखर आरी के सामान दिखाई देता है इसीलिए इस पर्वत को आरीवली कहा गया जो कालान्तर में अरावली हो गया !


मध्य प्रदेश की सिमा से भी होकर गुजरता है अरावली !

अरावली पर्वत का लगभग 80% हिस्सा राजस्थान से होकर गुजरता है i अरावली पर्वत श्रंखला में अनेक वाइल्ड लाइफ सेंचुरी तथा चिड़ियाघर भी मौजूद है !

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन हिंगलाज गढ़ तथा गढ़ में स्थित हिंगलाज माता के मंदिर के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें !


अरावली पर्वत सदियों से भील आदिवासियों की संस्कृति तथा उन्नत मानव सभ्यता की मुख्य क्रियाओं का केंद्र रहा है!

the gret aravali mountain range
चतुर्भुज नाला भानपुरा अरावली माउंटेन रेंज 


इस पर्वत का एक छोटा सा हिस्सा राजस्थान की सीमा से लगा हुआ मध्यप्रदेश के गांधी सागर वन्य जीव अभ्यारण से होकर गुजरता है  यहां पर कई जगह जैसे चतुर्भुज नाला, चिब्बड़ नाला, सीता खरडी आदि स्थानों में आपको पाषाण कालीन मानव सभ्यता के अवशेष और उनके दैनिक जीवन के क्रियाकलाप उनके द्वारा बनाए गए शेल चित्रो के माध्यम से देखने को मिलते है !

the great aravali mountain range
चतुर्भुज नाला भानपुरा अरावली माउंटेन रेंज 

the great aravali mountain range
चिब्बड़ नाला रॉक पेंटिंग भानपुरा अरावली माउंटेन रेंज 
चिब्बड़ नाला-भानपुरा (M.P.)गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन चिब्बड़ माता के मंदिर तथा पाषाण कालीन शैलचित्र के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


यहां पर पाई गई रॉक पेंटिंग, रॉक कट गुफाए, पेट्रोग्लिफ्स "रॉक आर्ट सोसाइटी ऑफ़ इंडिया "के द्वारा कराये गए कार्बन डेटिंग के अनुसार 35 हजार साल तक पुरानी बताई जाती है!

the gret aravali mountain range
चतुर्भुज नाला रॉक पेंटिंग भानपुरा अरावली माउंटेन रेंज 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित प्राचिन एवं ऐतिहासिक चतुर्भूज नाथ मंदिर तथा चतुर्भूज नाला में स्थित विश्व की सबसे लंबी पाषाणकालीन शेलचित्र श्रंखला के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें !


वहीँ दर की चटटान नाम की जगह पर चटटान के दोनों और पाषाण कालीन मानवों द्वारा बनाये गए 550 से भी अधिक कप के आकार के निशान मौजूद है जो 2 से 4 लाख  वर्ष पुराने  है  और दुनिया की सबसे पुरानी मानव सभ्यता होने का प्रमाण देते है!

the gret aravali mountain range
दर की चट्टान रॉक आर्ट साइट भानपुरा अरावली माउंटेन रेंज 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन नागों के राजा तक्षक तथा आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि जी के निवास स्थान प्राचिन तक्षकेश्वर मंदिर तथा पवित्र झरने के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें 


अरावली पर्वत सदियों से न जाने कितने ऐतिहासिक, प्रागैतिहासिक, धार्मिक,और पाषाण कालीन मानव सभ्यताओं को अपने आंचल में संजोए हुए है!


अरावली पहाड़ियों के भुगर्भ की स्थिति कैसी है ?


अरावली पर्वत कई दुर्लभ वनस्पतियों तथा कई लुप्तप्राय जीवोँ का निवास स्थान होने के साथ साथ कई प्रकार के खनिजों का उत्खनन करने का केंद्र भी है और यही कारण है कि पिछले 50 वर्षों में राजस्थान व हरियाणा में स्थित 128 अरावली की पहाड़ियों में से 31 पहाड़िया पूरी तरह से अवैध उत्खनन के चलते गायब हो चुकी है ! राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में ढाई हजार से भी अधिक खदानें हैं जो 100 मीटर से भी गहरी है अवैध खनन के चलते इन खदानों में लगातार ब्लास्ट होते रहते हैं तथा गहरे गड्डे बन गये है भूगर्भ शास्त्रियों ने चेताया है की लगातार ब्लास्ट होने की वजह से अरावली पर्वत के भूगर्भ प्लेट में दरारें बढ़ गयी है जिससे भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा आने का खतरा बढ़ गया है 

खदानों में लगातार ब्लास्ट होने से अरावली पर्वत के भूगर्भ जॉइंट प्रभावित हो रहें हैं !


अरावली पहाड़ियों को बचाने के लिए क्या कानूनी प्रयास किए गए हैं?


  • अरावली क्षेत्र को 1900 में पंजाब भू संरक्षण अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत संरक्षित किया गया है जिसके अनुसार अरावली वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार कार्य करना गैरकानूनी माना जायेगा !
  • सुप्रीम कोर्ट के सन 1992 के  आदेशानुसार अरावली रेंज के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का नया निर्माण नहीं किया जा सकता है और जो निर्माण हो चुका है उसे गिराया जा सकता है
  • सुप्रीम कोर्ट के 2002 के आदेशानुसार जब तक केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति ना ली जाए तब तक किसी भी प्रकार का अरावली में खनन का कार्य नहीं किया जा सकता!
  • गुजरात के पोरबंदर से लेकर पानीपत तक एक ग्रीन वॉल बनाए जाने की योजना प्रस्तावित है जिसमें अरावली रेंज के भूमि क्षरण  तथा रेगिस्तान के विस्तार को रोकना शामिल है

उत्तर भारत के जागरूक लोगों तथा कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर अरावली को बचाने के लिए कई बार धरना प्रदर्शन आदि किया जाता है!


अरावली रेंज को बचाना एक असंभव कार्य क्यों है?

 जब तक राजनीतिक पार्टियां, सरकार, अफसरशाही आदि ना चाहे तब तक अरावली रेंज को बचा पाना असंभव है ऐसा लगता है जैसे सरकार, अफसरशाही अरावली माउंटेन रेंज को बचाना नहीं बल्कि मिटाना चाहते हैं!

राजस्थान में अरावली की 128 पहाड़ियों में से 31  पहाड़ियां अवैध खनन की वजह से पूरी तरह से गायब हो चुकी है  यानी लगभग 25% अरावली की पहाड़ियां पूरी तरह से गायब हो चुकी है सुप्रीम कोर्ट ने  इस मामले का संज्ञान लेते हुए राजस्थान सरकार से पूछा था कि आखिर 28 पहाड़िया गायब कैसे हुई क्या हनुमान जी इन पहाड़ियों  को उठा ले गए !

वही हरियाणा सरकार की बात ही निराली है, सुप्रीम कोर्ट के 2009 के आदेशानुसार अरावली की स्थिति जस की तस रखने की यानी इस रेंज में किसी भी प्रकार का खनन या निर्माण आदि का कार्य नहीं किया जा सकता! हरियाणा सरकार ने इस मामले की अनदेखी करते हुए यहां कई अमीर शख्सियतों को होटल आदि बनाने का कार्य दे दिया था !सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को अवमानना का दोषी माना है!

भारत में अरावली रेंज में सबसे कम वन क्षेत्र मात्र लगभग 3.5% हरियाणा में बचा हुआ है जिसे भी खत्म करना चाहते हैं!

अभी हाल ही में हरियाणा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक अपील दायर की है कि कोरोना महामारी की वजह से हरियाणा में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई है और हरियाणा सरकार की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई है !

इसीलिए हरियाणा की बेरोजगारी दूर करने तथा हरियाणा सरकार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अरावली रेंज में खनन की इजाजत दी जाए!  सर्वोच्च न्यायालय भी इस बात पर विचार कर रहा है!

सिर्फ लोगों के जागरूक होने से या आम आदमी के धरना प्रदर्शन से अरावली हिल्स को बचाया नहीं जा सकता! राजनीति में खनन माफियाओं तथा भू माफियाओं के प्रभाव को खत्म करना होगा!

भानपुरा मध्यप्रदेश के प्रमुख धार्मिक व ऐतिहासिक दूधाखेड़ी माता के मंदिर के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें !

अरावली पर्वत के पठार का नाम क्या है?

अरावली माउंटेन के प्रमुख पठार का नाम इस प्रकार है!

  • आबू का पठार :- माउंट आबू के सिरोही जिले में इस चीज से इस प्रकार पर माउंट आबू नगर बसा हुआ है!
  • लेसलिया का पठार :- राजस्थान के उदयपुर जिले में पड़ता है!
  • बिजासन का पठार:- राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित है!
  • उड़ीसा का पठार:- राजस्थान का सबसे ऊंचा पठार है और सिरोही जिले में स्थित है!
  • भारोठ का पठार:- राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित है!
  • ऊपरमाल का पठार:- राजस्थान के बिजोलिया में भीलवाड़ा से भैसरोड गढ़ और चित्तौड़ तक स्थित है!
  • मैसा का पठार :- चित्तौड़ का किला इसी पठार पर बना हुआ है!

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें !

राजस्थान के लिए अरावली पर्वत कैसे सहायक है?


अरावली पर्वत ने राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान यानी की थार के रेगिस्तान को फैलने से रोका हुआ है! और यही कारण है कि थार का रेगिस्तान  दिल्ली या भारत के पूर्व तक नहीं पहुंच पाया है!

इसके अलावा अरावली पर्वत ग्राउंडवाटर रिचार्ज करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है!कई जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल भी है!

अरावली पर्वत में फैले हुए वन प्रदूषण को कम करने में तथा पर्यावरण को संतुलित करने में बहुत सहायक है, यह एक कार्बन सिंक की तरह कार्य करता है!

अरावली पहाड़ियों में गुजरात में स्थित आखिरी गांव कौन सा है?

अरावली पर्वत गुजरात के खेड़ाब्रह्मा से शुरू होता है और गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, और दिल्ली पहुंचकर समतल मैदान में परिवर्तित हो जाता है !


अरावली की पहाड़ियाँ राजस्थान को कितने भागों में बांटती हैं?

अरावली माउंटेन रेंज राजस्थान राज्य को दो भागों में बांटती है! अरावली का पश्चिमी भाग मारवाड़ और अरावली का पूर्वी भाग मेवाड़ कहलाता है !अरावली का पश्चिमी भाग रेतीला है वहीँ पूर्वी भाग ठोस तथा पथरीला है ! अरावली का सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र यही है और यही सबसे ज्यादा अवैध खनन किया जाता है!

राजस्थान में अरावली को तीन भागों में बांटा गया है !

1.उत्तरी अरावली :-सीकर, झुंझनू, अलवर, जयपुर के क्षेत्र आते है ! इस क्षेत्र में अरावली पर्वत की औसत ऊंचाई 450 मीटर है और सबसे ऊंची चोटी रघुनाथगढ़ सीकर में 1055 मीटर ऊंची है!

2.मध्य अरावली:- इस क्षेत्र में अजमेर का अरावली क्षेत्र आता है यहां अरावली पर्वत की औसत ऊंचाई 700 मीटर और क्षेत्र की सबसे ऊंची पर्वत चोटी मोरामजी जिसकी ऊंचाई 933 मीटर है!

3. दक्षिणी अरावली:- राजसमंद, सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर

आदि का अरावली क्षेत्र आता है क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर जो माउंट आबू के सिरोही में है जिसकी ऊंचाई  1727 मीटर है!

आखिर में यही कहना चाहता हूँ की सामान्य लोगों को ही राजनैतिक पार्टियों या नेताओं पर दबाव डालना चाहिए जिससे अरावली रेंज को बचाया जा सके !

इस पोस्ट में अरावली माउंटेन रेंज के बारे में एक सामान्य जानकारी दी है उम्मीद करता हूँ ये जानकारी आपको पसंद आये !

पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !

रविवार, मार्च 21, 2021

चतुर्भुजनाला भानपुरा के पाषाणकालीन शैलचित्र

भानपुरा से करीब 30 किलोमीटर दूर गांधी सागर मार्ग अरावली पर्वतमाला तथा गांधीसागर वन्यजीव अभ्यारण क्षेत्र में स्थित करीब 10 वीं शताब्दी में बना चतुर्भुजनाथ मंदिर अद्भुत व ऐतिहासिक है !

Chaturbhuj nath,चतुर्भुजनाला भानपुरा के पाषाणकालीन शैलचित्र
चतुर्भुजनाला भानपुरा में स्थित चतुर्भुज नाथ कि प्रतिमा  


पास ही एक बारहमासी नाला बहता है जिसे चतुर्भुज नाला कहा जाता है! इस नाले के रॉक शेल्टर्स में दुनिया की सबसे लंबी (लगभग पाँच किलोमीटर लंबी ) प्रागैतिहासिक कालीन शैलचित्र श्रंखला मौजूद है! जिसमें ढाई हजार से ज्यादा शैलचित्र मौजूद है,जो प्रागैतिहासिक कालीन मानवों की दैनिक जीवन क्रीड़ा प्रस्तुत करती है!

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चतुर्भुजनाला भानपुरा के पाषाणकालीन शैलचित्र 
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत मालाओं में से एक अरावली पर्वत के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें!


मैंने कल शाम को ही अपने साथ धागा मिल में कार्य कर चुके संजू को फोन करके बता दिया था की आज हमें चतुर्भूज नाला रॉक पेंटिंग स्थल पर चलना है संजू एक अच्छा बाइक राइडर होने के साथ साथ मेरा भरोसेमंद व्यक्ति भी है !

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योजनानुसार हम बाइक लेकर घर से सुबह 10 बजे चल पड़े और करीब 11 बजे भानपुरा पहुंचकर सबसे पहले हमने अपनी पसंदीदा दुकान पर समोसे का नाश्ता किया नाश्ता करने का मौका हम कभी भी नहीं छोड़ते!

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भानपुरा में नाश्ता करते हुए 


खैर अब हम गांधीसागर मार्ग में पड़ने वाले पेट्रोलपंप से पेट्रोल भरवाकर लगभग 35 किलोमीटर हमारी मंजिल चतुर्भूज नाला रॉक पेंटिंग की ओर चल पड़े !

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चतुर्भुजनाला भानपुरा के पाषाणकालीन शैलचित्र 


मार्ग में करीब एक घंटा चलने के बाद हमें एक चाय की दुकान मिली जहाँ बाइक रोककर हमने चाय पी और रास्ता पूछा!यहाँ के लोग हमें बहुत ही फ्रेंडली और हेल्पफुल लगे उन लोगों ने हमें बताया की 3 किलोमीटर जाने के बाद एक बहुत बड़ा बोर्ड नजर आएगा वहाँ से 6 किलोमीटर उत्तर दिशा की और एक कच्चा रास्ता है जो की काफी घने जंगल के भीतर जाता है !

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चतुर्भुजनाला भानपुरा के पाषाणकालीन शैलचित्र 


गांधी सागर बांध-भानपुरा (M. P. ) के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


उन लोगों के बताये अनुसार हम आगे चल पड़े आगे हमें एक बोर्ड नजर आया जो रास्ता बता रहा था वहाँ से हम उत्तर दिशा की और मुड़े आगे का कच्चा रास्ता बेहद डरावना था मार्ग में कोई व्यक्ति नजर नहीं आया !दो जगह हमें नीलगायों के झुण्ड मिले जिनसे हमने एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखी करीब 6 किलोमीटर चलने के बाद हमें एक मंदिर नजर आया इस मंदिर का नाम चतुर्भूज नाथ मंदिर है !

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चतुर्भूज नाला मार्ग में दिखाई दी नीलगाय 

चिब्बड़ नाला-भानपुरा (M.P.)गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन चिब्बड़ माता के मंदिर तथा पाषाण कालीन शैलचित्र के बारे में जानने के लिये यहाँ click करें !


बताया जाता है की यह मंदिर हजारों साल पुराना है मंदिर या मंदिर के आसपास कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं था तथा यह मंदिर चारों और से बंद था हमने मंदिर की दीवार में लगी जाली से झांक कर चतुर्भूज नाथ के दर्शन किये और श्रद्धा अनुसार चढ़ावा चढ़ाया और कुछ देर वहीँ छाया में विश्राम किया !

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चतुर्भूज नाथ मंदिर 

Table of contents



आइये जानते है चतुर्भूज नाथ मंदिर के बारे में !


चतुर्भुज नाथ मंदिर!

मंदिर का इतिहास स्पष्ट नहीं है फिर भी ऐसा माना जाता है कि इस चतुर्भुज नाथ मंदिर का निर्माण आठवीं से दसवीं  शताब्दी के लगभग होना बताया जाता है और साथ ही इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि समय-समय पर यहां के स्थानीय शासक महाराव यशवंत राव होलकर के द्वारा युद्ध में जाने से पहले यहां पर अनुष्ठान किए जाते थे

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चतुर्भूज नाथ मंदिर 

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन नागों के राजा तक्षक तथा आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि जी के निवास स्थान प्राचिन तक्षकेश्वर मंदिर तथा पवित्र झरने के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें 



मंदिर में भगवान विष्णु की एक सोई हुई प्रतिमा है जो करीब 1000 साल पुरानी है !जिसमे चार भुजाएं होने के कारण  चतुर्भुज नाथ कहा गया ! चेहरे पर अद्भुत मुस्कुराहट लिए हुए उनके पैरों के पास एक सेवक को दिखाया गया है स्थानीय मान्यता अनुसार यह भगवान के पैरों से कांटा निकालता  हुआ  अलौकिक तथा अविस्मरणीय दृश्य प्रस्तुत करता है!

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मंदिर में स्थित चतुर्भूज नाथ की प्रतिमा 


मानसून के दौरान यहां चारों तरफ हरियाली और पास में चतुर्भुज नाला पानी से भरा हुआ  बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है और यही कारण है कि यहां देश-विदेश से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं!


चतुर्भुज नाथ की पवित्र जल धारा!

चतुर्भुज नाथ मंदिर के नीचे की तरफ एक प्राकृतिक जलधारा मौजूद है जिसमें से लगातार जल प्रवाहित होता रहता है भीषण गर्मी में भी यह जलधारा निर्विरोध रूप से बहती रहती है इसमें एक लोहे का पाइप लगा दिया गया है जिससे होकर जलधारा बाहर आती है इस जलधारा का प्रयोग पीने के पानी के रूप में किया जाता है!

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ऐसा कहा जाता है कि यह जलधारा भगवान चतुर्भुज नाथ के चरणों से होकर आ रही है इसलिए अमृत समान गुणकारी मानी जाती है यहां आकर हमने भी इस अमृत समान जल का उपयोग करके अपने प्यास बुझाई और एक बोतल पानी भर लिया!

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गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचिन हिंगलाज गढ़ तथा गढ़ में स्थित हिंगलाज माता के मंदिर के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें !


चतुर्भुज नाला !

पानी पीने के बाद हम करीब 2 घंटे तक इस नाले के चारों ओर घूमते रहे और शैल चित्रों की खोज करते रहे हमें कई जगह शैल चित्र मिले परंतु असली जगह की हमें जानकारी नहीं थी बाद में हमें रास्ते में एक छोटा सा पत्थर दिखाई दिया जिस पर 2 किलोमीटर दूर शेलचित्र होने का संकेत दर्शाया हुवा था !

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चतुर्भूज नाला मार्ग बताता एक पत्थर 


चतुर्भुज नाला में प्राकृतिक रूप से जल धाराए बहती रहती है जो देखने में मानव निर्मित प्रतीत होती है !लेकिन असल में यह जल धाराए प्राकृतिक है! यहां कई प्रजाति की मछलियां पाई जाती है !जिन्हें लोग दाना खिलाते हुए देखे जा सकते हैं!

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चतुर्भूज नाला 

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य की जानकारी व घूमने के स्थान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें !

चतुर्भुजनाला पाषाणकालीन शैलचित्र स्थल!


मार्ग में दर्शाए गए बोर्ड के अनुसार 2 किलोमीटर चलने के बाद हमें एक बड़ा बोर्ड नजर आया जो चतुर्भुज नाला रॉक पेंटिंग लिखा हुआ दर्शा रहा था! 

नाले में उतरने का रास्ता बहुत ही खतरनाक था जरा सी चूक हो जाने पर चोट लगने का खतरा बना रहता है !

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चतुर्भूज नाले का खतरनाक मार्ग 

मालवा के प्रसिद्ध धार्मिक व ऐतिहासिक दूधाखेड़ी माताजी का मंदिर भानपुरा मध्यप्रदेश के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें !

नाले में नीचे उतरने के बाद काफी दूर कुछ लोग दिखाई दिए पास आने पर पता चला कि वे लोग "रॉक आर्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया" के लोग थे जिनकी ड्यूटी यहाँ लगाई गई थी ! इस जगह के रखरखाव और निगरानी के लिए कुल 5 लोगों की  ड्यूटी यहां लगी हुई है !सही तरीके से पेश आने पर यह लोग फ्रेंडली होते हैं लेकिन कहीं ना कहीं इन लोगों की कोशिश होती है कि आप यहां से जल्द से जल्द देख कर निकल जाए एक निश्चित दूरी तक यह लोग आपके साथ होते हैं और आगे जाने के लिए मना कर देते हैं !

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चतुर्भूज नाले में R.A.S.I.के कर्मचारीयों के साथ 


यहां पर रजिस्टर में नाम दर्ज किया जाता है तथा देखने का कोई चार्ज नहीं है ! शैलचित्र देखने का समय सुबह 9:00 से 5:00 बजे तक का है !

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R.A.S.I.के कर्मचारी रजिस्टर में नाम दर्ज करते हुवे 


इन शेल चित्रों को सर्वप्रथम एक स्थानीय शिक्षक डॉ रमेश कुमार पंचोली व उनके साथियों ने 1973 में भ्रमण के दौरान खोजा था!जो चतुर्भुज नाला के शेल आश्रयो में स्थित है! कार्बन डेटिंग के अनुसार यह शैल चित्र तकरीबन 35000 साल पुराने बताए जाते हैं ! जो यह साबित करता है कि यहां कभी प्रागैतिहासिक काल के दौरान आदिमानव का बसेरा रहा होगा और उनके द्वारा ही यह शेल चित्र बनाये गये होंगे !रॉक आर्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया(RASI) ने जनवरी 2007 में इसे दुनिया में "सबसे लंबी शैल चित्र श्रंखला "के रूप में वर्णित किया है!

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जानवर को पिंजरे से निकालते हुवे 


शैल चित्रों का विषय वस्तु मनुष्य तथा जानवर है!इनमें हाथी, बाइसन,बाघ,तेंदुए,गेंडे,हिरण,लोमड़ी,गाय,बैल,ऊंट तथा पानी के जानवर है !

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हिरन के पेट में गर्भधारण का शैलचित्र 


शेल चित्रों का रंग व बनावट असमान है !ज्यादातर शेल चित्र लाल रंग गेरू रंग कुछ चमकीले तथा अन्य फिके लाल सफेद तथा काले हैं!

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जानवर को रस्सी से पकड़ते हुवे दर्शाया गया है साथ में जानवर की खाल की डिज़ाइन का शैलचित्र 


कई जगह शेल चित्रों में दैनिक जीवन की झलक दिखाई  दिखाई गई है,जैसे चरवाहा,शिकार करना,मवेशी की सवारी आदि !

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खुशियाँ मनाते हुवे दर्शाया गया शेलचित्र 


शैल चित्रों को बनाने में जानवरों के रक्त, हड्डियों का चूर्ण  तथा चर्बी का उपयोग किया गया लगता है!

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बारहसिंगा को दर्शाया गया शैलचित्र 


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हाथों में हल, फरसा तथा अन्य हथियार उठाये हुवे 

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खरगोश और बिच्छू को दर्शाया गया शैलचित्र 

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जानवरो के बच्चे अपनी माँ का दूध पीते हुवे और चारा खाते हुवे 

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डांडिया के साथ शैल नृत्य तथा कावड़ को उठाये हुवे दर्शाया गया है 

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आश्चर्य होता है उस ज़माने में चौसर जैसा कोई खेल खेला जाता था 


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हाथ में मशाल लिए चार घोड़ो वाले रथ की शाही सवारी 

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दैनिक दिनचर्या सिर पर लकड़ी का गट्ठर उठाये हुवे 

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जानवरों के सहवास को दर्शाते हुवे शैलचित्र 

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शाही सेना हाथी, घोडा के साथ सवारी 

ढोल बजाकर पाषाण कालीन हथियार प्रदर्शन दर्शाते हुवे 


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चढ़ने के लिए सीढ़ी को दर्शाया गया है 

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दो घोड़ो वाले रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना करते हुवे शैलचित्र 

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कुछ और दैनिक क्रिया दर्शाते हुवे शैलचित्र 

दोस्तों विश्वास नहीं होता है कि आज से 35000 साल पहले हमारे इस क्षेत्र में कितनी उन्नत मानव सभ्यता निवास करती थी जिनको पहियों के बारे में भी जानकारी थी और चौसर जैसे खेलों को भी जानती थी!

खैर, इस जगह से हम 5:00 बजे निकल चुके थे क्योंकि रास्ता बहुत ही खराब था और जंगली जानवरों का भी डर था ! घर पहुंचते समय अंधेरा हो चुका था!

यात्रा के दौरान सावधानियाँ !

  • अकेले न जाएं किसी जानकार को साथ लेकर जाए !
  • उचित मात्रा में पीने का पानी साथ रखें व खाने पिने का प्रबन्ध रखें !
  • यदि आप उच्च या निम्न रक्त चाप रोगी हैं तो जाने से बचे !
  • अपने साथ उचित दवाई गोलियों का प्रबंध रखें 
  • ये क्षेत्र वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा है तथा यहां कई जंगली  जानवर तेंदुआ, भालू, लकड़बग्गा आदि का निवास है ! अतःहमेशा सावधान रहे !


कब जाएं !

वैसे तो इस स्थान पर किसी भी मौसम में जा सकते हैं परन्तु वर्षा ऋतू में रास्ता थोड़ा ख़राब हो सकता है !गर्मी के मौसम मे वातावरण शुष्क होने से तेज गर्मी होती है ! अक्टूबर माह से मार्च माह तक मौसम ठंडा होने से जाना सबसे अनुकूल होता है !


कैसे जाएं  !

भानपुरा मालवा मध्य प्रदेश मंदसौर जिले का हिस्सा है जो  राजस्थान झालावाड़ जिले से सटा हुआ है! नजदीकी रेलवे स्टेशन दिल्ली मुंबई रेल मार्ग पर स्थित भवानी मंडी है जो कि 25 किलोमीटर पड़ता है और रामगंज मंडी जो कि 40 किलोमीटर पड़ता है! यहां से बस मार्ग द्वारा भानपुरा आसानी से पहुंचा जा सकता है!और भानपुरा से किसी व्यक्तिगत वाहन बाइक या कार द्वारा चतुर्भूज नाला तक जा सकते हैं !


इस लेख के माध्यम से मैंने अरावली पहाड़ में स्थित मालवा कि  ऐतिहासिक तथा प्रागेतिहासिक धरोहर चतुर्भुज मंदिर और चतुर्भूज नाला में स्थित प्रागेतिहासिक शैलचित्र  के बारे में विस्तृत जानकारी दी है !उम्मीद करता हूं कि आपको यह लेख पसंद आये !

 

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